नोट : यह मूल ब्लॉग " अनंत अपार असीम आकाश" की मात्र प्रतिलिपि है, जिसका यू.आर.एल. निम्न है:-
आपके परिचर्चा,प्रतिक्रिया एवं टिप्पणी हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से प्रस्तुत है-
क्षमा करो हे मातु... आशीष माँगने मै आया ।
Sep
18
क्षमा करो हे मातु सरस्वती , जिह्वा का मान ना रख पाया ।
करके प्रयोग कटु शब्दों का , अपमान तेरा करता आया ।
अपने लिखे हुए शब्दों से , भला ना कोई कर पाया ।
उलटे औरों का अहित सदा , अब तक मै करता आया ।
क्षमा करो हे मातु भगवती , ना सज्जनता अपना पाया ।
कुटिल कलुष प्राणी बनकर , दुर्जनता ही करता आया ।
दया धर्म का किया दिखावा , जन कल्याण ना कोई कर पाया ।
भुला सभी की आकांक्षा , निज स्वार्थ सिद्ध करता आया ।
क्षमा करो हे मातु गायत्री , मै तेज ना धारण कर पाया ।उलटे अपने अंतरतम से , अँधियारा घना करता आया ।अगणित अवसर तुमने दिया , पहचान ना उसको मै पाया ।हठ और अहम् के दोषों से , घनीभूत स्वयं को करता आया ।
क्षमा करो हे मातु धारणी , मानव नहीं मै बन पाया ।
राक्षस और निशाचर सा , मै जीवन अब तक जीता आया ।
विद्दया तप ना दान शील , ना ज्ञान धर्म अपना पाया ।
तेरे ऊपर बनकर भार , पशु सा विचरण करता आया ।
क्षमा करो हे मातु जननी , सुपुत्र नहीं मै बन पाया ।
तेरी सेवा कर सका ना मै , दूर ही तुझसे रहता आया ।
जन्म से लेकर अब तक मै , सदा ममता ही तुझसे पाया ।
पर कर्ज चुकाना मुझे दूध का , ये याद मुझे ना रह पाया ।
क्षमा करो हे मातु सभी , समझ देर से मै पाया ।
क्षमा मांगने तेरे आगे , मै हाथ जोड़ कर अब आया ।
कर सको क्षमा मुझ अधम को जो , समझूँगा वरदान प्रगति का मै पाया ।
सदकर्मो से ना डिगूं कभी , यही आशीष माँगने मै आया ।
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG
Saturday, September 18, 2010 | Labels: अनंत अपार असीम आकाश : http://vivekmishra001.blogspot.com, धर्म-कर्म, मेरी कविताएँ |
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अनुरोध
शब्दों पर ना जाये मेरे,बस भावों पर ही ध्यान दें।
अगर कहीं कोई भूल दिखे,उसे भूल समझकर टाल दें।
खोजें नहीं मुझे शब्दों में,मै शब्दों में नहीं रहता हूँ।
जो कुछ भी मै लिखता हूँ, अपनी जबानी कहता हूँ।
ये प्रेम-विरह की साँसे हो,या छल और कपट की बातें हो।
सब राग-रंग और भेष तेरे,बस शब्द लिखे मेरे अपने है।
तुम चाहो समझो इसे हकीकत,या समझो तुम इसे फँसाना।
मुझको तो जो लिखना था, मै लिखकर यारो हुआ बेगाना।
विवेक मिश्र 'अनंत'
लेखा बही
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3 comments:
मन मॆं उतर गई रचना...
मन मॆं उतर गई रचना...
आपकी लेखनी से पाठक के मन की वाणी निकलती । बहुत ही सुंदर रचना है।
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