नोट : यह मूल ब्लॉग " अनंत अपार असीम आकाश" की मात्र प्रतिलिपि है, जिसका यू.आर.एल. निम्न है:-
आपके परिचर्चा,प्रतिक्रिया एवं टिप्पणी हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से प्रस्तुत है-
नियति निगोड़ी
रूठो ना तुम मुझसे प्रियवर , नहीं दोष इसमें मेरा ।
आ जाऊंगा लौट के मै , जैसे होगा नया सबेरा ।
मै भी आहत हूँ बाणों से , जो नियति के हाथों छूटे हैं ।
घायल है मेरा अंतरमन , कुछ अपने भी मुझसे रूठे है ।
तन तो शायद सह जाता , मन नहीं चोट सह पाया है ।
कुटिल नियति की चालो ने , हमको बहुत सताया है ।
सोंचा था कुछ बातें होगी , गीत सुनेगें तुमसे हम ।
बाँहों में तुमको भरकर , सुन्दर सपने देखेंगे हम ।
लेकिन नियति निगोड़ी को , स्वीकार नहीं है ख़ुशी हमारी ।
रात चांदनी आती उससे , पहले आ गयी जाने की बारी ।
बनकर सौतन तेरी वो, जबरन मुझे बुलाती है ।
मुझको मेरे कर्तव्यों की , सौगंध याद दिलाती है ।
Tuesday, September 21, 2010 | Labels: अनंत अपार असीम आकाश : http://vivekmishra001.blogspot.com, मेरी कविताएँ, राग-रंग |
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- आइये अभिवादन करें
- सबके अपने अपने ईश्वर , जाने कितने जग के ईश्वर ?
- इस १००वे पोस्ट पर आप सभी से पुन: अनुरोध है..
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- नियति निगोड़ी
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अनुरोध
शब्दों पर ना जाये मेरे,बस भावों पर ही ध्यान दें।
अगर कहीं कोई भूल दिखे,उसे भूल समझकर टाल दें।
खोजें नहीं मुझे शब्दों में,मै शब्दों में नहीं रहता हूँ।
जो कुछ भी मै लिखता हूँ, अपनी जबानी कहता हूँ।
ये प्रेम-विरह की साँसे हो,या छल और कपट की बातें हो।
सब राग-रंग और भेष तेरे,बस शब्द लिखे मेरे अपने है।
तुम चाहो समझो इसे हकीकत,या समझो तुम इसे फँसाना।
मुझको तो जो लिखना था, मै लिखकर यारो हुआ बेगाना।
विवेक मिश्र 'अनंत'
लेखा बही
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1 comments:
मुझको मेरे कर्त्तव्यों की सौगंध याद दिलाती है...
मन को छूने वाली पंक्ति...कर्त्तव्य ही याद रहे तो फिर फसाद काहे के....
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