नोट : यह मूल ब्लॉग " अनंत अपार असीम आकाश" की मात्र प्रतिलिपि है, जिसका यू.आर.एल. निम्न है:-
आपके परिचर्चा,प्रतिक्रिया एवं टिप्पणी हेतु,मेरी डायरी के पन्नो से प्रस्तुत है-
आँधियों का दौर है
Sep
20
आँधियों का दौर है , सर झुकाकर चलने दो ।
आँधियों के बाद भी , सर उठाकर चलना है ।
जग भले कहे इसे कायरता , कौटिल्य की ये कूटनीति ।
इसके बिना सफल कब , होती कोई युद्ध नीति ।
हर सर की होती मर्यादा , हर दर पे झुकना ठीक नहीं ।
लेकिन बिना सबब के कोई , शीश गवाँना उचित नहीं ।
वो वृक्ष उखड जाते है जो , हर छण तन कर रहते है ।
जीवित रहते वृक्ष वही जो , कुछ पल नम्र भी रहते हैं ।है आज अगर सत्ता उनकी , मदमस्त उन्हें तुम और करो ।
तुम शीश झुकाकर भले चलो , मठ्ठे से जड़े उनकी भरो ।
फिर जब होगा अंतिम फैसला , सीने पर तीर चलाना तुम ।
विस्मित करके अरि-दल को , फिर विजयी शीश उठाना तुम ।
© सर्वाधिकार प्रयोक्तागण 2010 विवेक मिश्र "अनंत" 3TW9SM3NGHMG
Monday, September 20, 2010 | Labels: अनंत अपार असीम आकाश : http://vivekmishra001.blogspot.com, कूटनीति, मेरी कविताएँ |
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अनुरोध
शब्दों पर ना जाये मेरे,बस भावों पर ही ध्यान दें।
अगर कहीं कोई भूल दिखे,उसे भूल समझकर टाल दें।
खोजें नहीं मुझे शब्दों में,मै शब्दों में नहीं रहता हूँ।
जो कुछ भी मै लिखता हूँ, अपनी जबानी कहता हूँ।
ये प्रेम-विरह की साँसे हो,या छल और कपट की बातें हो।
सब राग-रंग और भेष तेरे,बस शब्द लिखे मेरे अपने है।
तुम चाहो समझो इसे हकीकत,या समझो तुम इसे फँसाना।
मुझको तो जो लिखना था, मै लिखकर यारो हुआ बेगाना।
विवेक मिश्र 'अनंत'
लेखा बही
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1 comments:
आजकल के हालत में सफल होने का एक सुन्दर रास्ता सुझाया है......बहुत सुन्दर.......
http://sharmakailashc.blogspot.com/
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